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गुलज़ार की मिली-जुली कविताएं | Gulzar hindi kavita

By Ranjan Gupta

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गुलज़ार की मिली-जुली कविताएं | Gulzar hindi kavita

गुलज़ार की कविताएँ संवेदनाओं, रिश्तों और ज़िंदगी के छोटे-छोटे लम्हों को गहराई से छूती हैं। उनकी रचनाओं में सादगी, दर्द, मोहब्बत और सोच की अनोखी परतें देखने को मिलती हैं। यहाँ प्रस्तुत हैं गुलज़ार (Gulzar poetry collection mixed hindi) की कुछ मिली-जुली चुनिंदा कविताएँ, जो दिल और दिमाग दोनों को छू जाएँगी। इन पंक्तियों में ज़िंदगी के अनुभव, एहसास और खामोशियों की खूबसूरत अभिव्यक्ति मिलती है।

Table of Contents

1. हम को मन की शक्ति देना, मन विजय करें

हम को मन की शक्ति देना, मन विजय करें
दूसरो की जय से पहले, ख़ुद को जय करें।

भेद भाव अपने दिल से साफ कर सकें
दोस्तों से भूल हो तो माफ़ कर सके
झूठ से बचे रहें, सच का दम भरें
दूसरो की जय से पहले ख़ुद को जय करें
हमको मन की शक्ति देना।

मुश्किलें पड़े तो हम पे, इतना कर्म कर
साथ दें तो धर्म का चलें तो धर्म पर
ख़ुद पर हौसला रहें बदी से न डरें
दूसरों की जय से पहले ख़ुद को जय करें
हमको मन की शक्ति देना, मन विजय करें।

2. रात चुपचाप दबे पाँव चली जाती है

रात चुपचाप दबे पाँव चली जाती है
रात ख़ामोश है रोती नहीं हँसती भी नहीं
कांच का नीला सा गुम्बद है, उड़ा जाता है
ख़ाली-ख़ाली कोई बजरा सा बहा जाता है
चाँद की किरणों में वो रोज़ सा रेशम भी नहीं
चाँद की चिकनी डली है कि घुली जाती है
और सन्नाटों की इक धूल सी उड़ी जाती है
काश इक बार कभी नींद से उठकर तुम भी
हिज्र की रातों में ये देखो तो क्या होता है

3. देखो, आहिस्ता चलो

देखो, आहिस्ता चलो, और भी आहिस्ता ज़रा
देखना, सोच-सँभल कर ज़रा पाँव रखना,
ज़ोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं.
काँच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में,
ख़्वाब टूटे न कोई, जाग न जाये देखो,
जाग जायेगा कोई ख़्वाब तो मर जाएगा

4. जय हो – Gulzar hindi poetry

जय हो, जय हो
जय हो, जय हो
आजा आजा जिंद शामियाने के तले,
आजा ज़रीवाले नीले आसमान के तले

जय हो, जय हो
जय हो, जय हो

रत्ती रत्ती सच्ची मैने जान गँवाई है,
नच नच कोयलों पे रात बिताई है
अखियों की नींद मैने फूंको से उड़ा दी,
गिन गिन तारे मैने उंगली जलाई है

जय हो, जय हो
जय हो, जय हो

चख ले हो चख ले ये रात शहद है चख ले,
रख ले हाँ दिल है दिल आखरी हद है रख ले
काला काला काजल तेरा कोई काला जादू है ना
काला काला काजल तेरा कोई काला जादू है ना

आजा आजा जिंद शामियाने के तले,
आजा ज़रीवाले नीले आसमान के तले

जय हो, जय हो
जय हो, जय हो

कब से हाँ कब से जो लब पे रुकी है कह दे,
कह दे हाँ कह दे अब आँख झुकी है.. कह दे
ऐसी ऐसी रोशन आँखे रोशन दोनो भी हैं हैं क्या

आजा आजा जिंद शामियाने के तले,
आजा ज़रीवाले नीले आसमान के तले

जय हो, जय हो
जय हो, जय हो

फिल्म- स्लमडॉग मिलियनेयर(2008)

5. सपना रे सपना

सपना रे सपना, है कोई अपना
अंखियों में आ भर जा
अंखियों की डिबिया, भर दे रे निंदिया
जादू से जादू कर जा
सपना रे सपना, है कोई अपना
अंखियों में आ भर जा ना

सपना रे सपना, है कोई अपना
अंखियों में आ भर जा ना

भूरे भूरे बादलों के भालू
लोरियां सुनाये लारा रा रु
तारों के कंचों से रात भर खेलेंगे
सपनों में चन्दा और तू

सपना रे सपना, है कोई अपना
अंखियों में आ भर जा

पीले पीले केसरी हैं गाँव
गीली गीली चांदनी की छाँव
बगुलों के जैसे रे डूबे हुए हैं रे
पानी में सपनों के पाँव

सपना रे सपना, है कोई अपना
अंखियों में आ भर जा
अंखियों की डिबिया, भर दे रे निंदिया
जादू से जादू कर जा

फिल्म - एक थी डायन(2013)

6. काली काली– Gulzar hindi kavita

काली काली आँखों का
काला काला जादू है
आधा आधा तुझ बिन मैं
आधी आधी सी तू है

काली काली आँखों का
काला काला जादू है
आज भी जुनूनी सी
जो एक आरज़ू है
यूँ ही तरसने दे
यह आँखें बरसने दे
तेरी आँखें दो आँखें
कभी शबनम कभी खुशबू है

काली काली आँखों का
काला काला जादू है
आधा आधा तुझ बिन मैं
आधी आधी सी तू है

[काली काली आँखों काला काला जादू]

गहरे समंदर और दो जज़ीरे
डूबे हुए हैं कितने ज़खीरे
ढूँढने दो अश्कों के मोती
सीपी से खोलो
पलकों से झांके तो झाँकने दो
कतरा कतरा गिनने दो
कतरा कतरा चुनने दो
कतरा कतरा रखना है ना
कतरा कतरा रखने दो
तेरी आँखों का यह साया
अँधेरे में कोई जुगनू है

काली काली आँखों का
काला काला जादू है
आधा आधा तुझ बिन मैं
आधी आधी सी तू है

जाने कहाँ पे बदलेंगे दोनों
उड़ते हुए यह शब के परिंदे
पलकों पे बैठा ले के उड़े हैं
दो बूँद दे दो प्यासे पड़े हैं
हाँ दो बूँदें
लम्हा लम्हा लम्हे दो
लम्हा लम्हा जीने दो
कह भी दो ना आँखों से
लम्हा लम्हा पीने दो
तेरी आँखें हल्का सा
छलका सा एक आंसू है

काली काली आँखों का
काला काला जादू है
आधा आधा तुझ बिन मैं
आधी आधी सी तू है

काली काली आँखों का
काला काला जादू है

फिल्म - एक थी डायन(2013)

7. रोको मत टोको मत

रोको मत टोको मत
सोचने दो इन्हें सोचने दो
रोको मत टोको मत
होए टोको मत इन्हें सोचने दो

मुश्किलों के हल खोजने दो
रोको मत टोको मत
निकलने तो दो आसमां से जुड़ेंगे
अरे अंडे के अन्दर ही कैसे उड़ेंगे यार

निकालने दो पाँव जुराबें बहुत हैं
किताबों के बाहर किताबें बहुत हैं

बच्चों के एक विज्ञापन के लिए लिखा जिंगल(2013)

8. जंगल जंगल पता चला है– Gulzar top nazm

जंगल जंगल बात चली है पता चला है
जंगल जंगल बात चली है पता चला है
अरे चड्डी पहन के फूल खिला है फूल खिला है

जंगल जंगल पता चला है
चड्डी पहन के फूल खिला है
जंगल जंगल पता चला है
चड्डी पहन के फूल खिला है

एक परिंदा है शर्मिंदा था वो नंगा
इससे तो अंडे के अन्दर था वो चंगा
सोच रहा है बाहर आखिर क्यों निकला है
अरे चड्डी पहन के फूल खिला है फूल खिला है

जंगल जंगल पता चला है
चड्डी पहन के फूल खिला है

मोगली सीरियल के लिए सुप्रसिद्ध गीत।

9. तोते उड़ गए

दिल मियाँ मिट्ठू थे
मर्ज़ी के पिट्ठू थे
हो दिल मियाँ मिट्ठू थे
अरे मर्ज़ी के पिट्ठू थे
वो मेरी कहाँ सुनते थे
अरे अपनी ही धुन पे थे
दिल मियाँ मिट्ठू थे

मियाँ जी बच बच के चलना
दुनिया है हरजाई
हरी हरी जो लागे
घास खड़ी है काई
अरे काई पे फिसले जो सुर्र करके
फुर्र करके तोते उड़ गए
फुर्र फुर्र करके तोते उड़ गए


इश्क में यूँ फिसले मियाँ
हाथों के तोते उड़ गए
तोते उड़ गए
फुर्र करके तोते उड़ गए
फुर्र फुर्र करके तोते उड़ गए

दिल मियाँ मिट्ठू थे
मर्ज़ी के पिट्ठू थे
अकड़े तो तगड़े से
और पकडे तो मकड़े से
दिल मियाँ मिट्ठू थे मिट्ठू मियाँ
मियाँ जी मुड़ मुड़ के न देखो
मुड़ मुड़ न देखो मियाँ जी
अजी नज़रों में कोई नहीं है
नज़र लगाईं थी अंखियाँ हाँ
सालों से सोई नहीं हैं
सपने से धंसने पे सुर्र

तोते! फुर्र करके तोते उड़ गए
ओ पतली गली में फिसले मियाँ
हाथो के तोते उड़ गए

मेरे नग मुंदरी विच पा दे
ते पावे मेरी जिंद कड लै
के पावे मेरी जिंद कड लै
अक्खी रात मैं गई तबेले
माझी मिल जावे.
मुक जान झमेले
माझी मिल जावे...
मुक जान झमेले
मेरी सेज ते अकल बिछा दे
ते पावे मेरी जिंद कड लै
के पावे मेरी जिंद कड लै

फुर्र करके तोते उड़ गए
फुर्र फुर्र करके तोते उड़ गए
फुर्र करके तोते उड़ गए
फुर्र फुर्र करके तोते उड़ गए

फिल्म - एक थी डायन(2013)

10. टैगोर

एक देहाती सर पे गुड की भेली बांधे,
लम्बे- चौडे एक मैदा से गुज़र रहा था
गुड की खुशबु सुनके भिन-भिन करती
एक छतरी सर पे मंडलाती थी
धूप चढ़ती और सूरज की गर्मी पहुची तो
गुड की भेली बहने लगी

मासूम देहाती हैरा था
माथे से मीठे-मीठे कतरे गिरते थे
और वो जीभ से चाट रहा था!

मै देहाती.........
मेरे सर पर ये टैगोर की कविता की भेली किसने रख दी!

11. पूरे का पूरा आकाश घुमा कर

पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाज़ी देखी मैने,
पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाज़ी देखी मैने

काले घर में सूरज चलके, तुमने शायद सोचा था
मेरे सब मोहरे पिट जायेंगे.
मैने एक चराग जलाकर रोशनी कर ली,
अपना रस्ता खोल लिया

तुमने एक समन्दर हाथ में लेकर मुझपे ढेल दिया,
मैने नोह की कश्ति उस के ऊपर रख दी

काल चला तुमने और मेरी जानिब देखा,
काल चला तुमने और मेरी जानिब देखा
मैने काल को तोड़कर,
लम्हा लम्हा जीना सीख लिया

मेरी खुदी को मारना चाहा
तुमने चन्द चमत्कारों से
मेरी खुदी को मारना चाहा तुमने
चन्द चमत्कारों से
और मेरे एक प्यादे ने चलते चलते
तेरा चांद का मोहरा मार लिया

मौत की शह देकर तुमने समझा था अब
तो मात हुई
मौत की शह देकर तुमने समझा था अब
तो मात हुई
मैने जिस्म का खोल उतारकर सौंप
दिया,
और रूह बचा ली

पूरे का पूरा आकाश घुमा कर अब
तुम देखो बाज़ी...

12. मौत तू एक कविता है

मौत तू एक कविता है
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको

डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लिये जब चांद उफक तक पहुँचे
दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के करीब
ना अंधेरा ना उजाला हो, ना अभी रात ना दिन

जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को जब साँस आऐ
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको

(इस कविता को हिन्दी फ़िल्म "आनंद" में डा. भास्कर
बैनर्जी नामक चरित्र के लिये लिखा गया था। इस चरित्र
को फ़िल्म में अमिताभ बच्चन ने निभाया था)

13. रात भर सर्द हवा चलती रही

रात भर सर्द हवा चलती रही
रात भर हमने अलाव तापा
मैंने माजी से कई खुश्क सी शाखें काटीं
तुमने भी गुजरे हुये लम्हों के पत्ते तोड़े
मैंने जेबों से निकालीं सभी सूखीं नज़्में
तुमने भी हाथों से मुरझाये हुये खत खोलें
अपनी इन आंखों से मैंने कई मांजे तोड़े
और हाथों से कई बासी लकीरें फेंकी
तुमने पलकों पे नामी सूख गयी थी, सो गिरा दी|

रात भर जो भी मिला उगते बदन पर हमको
काट के दाल दिया जलाते अलावों मसं उसे
रात भर फून्कों से हर लोऊ को जगाये रखा
और दो जिस्मों के ईंधन को जलाए रखा
रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने|

14. लैंडस्केप-1

दूर सुनसान-से साहिल के क़रीब
एक जवाँ पेड़ के पास
उम्र के दर्द लिए वक़्त मटियाला दोशाला ओढ़े
बूढ़ा-सा पाम का इक पेड़, खड़ा है कब से
सैकड़ों सालों की तन्हाई के बद
झुक के कहता है जवाँ पेड़ से... ’यार!
तन्हाई है! कुछ बात करो!’

15. लैंडस्केप-2

कोई मेला लगा है परबत पर
सब्ज़ाज़ारों पर चढ़ रहे हैं लोग
टोलियाँ कुछ रुकी हुईं ढलानों पर
दाग़ लगते हैं इक पके फल पर
दूर सीवन उधेड़ती-चढ़ती,
एक पगडंडी बढ़ रही है सब्ज़े पर!

चूंटियाँ लग गई हैं इस पहाड़ी को
जैसे अमरूद सड़ रहा है कोई!

16. कुछ और मंजर-1

कभी कभी लैम्प पोस्ट के नीचे कोई लड़का
दबा के पैन्सिल को उंगलियों में
मुड़े-तुड़े काग़ज़ों को घुटनों पे रख के
लिखता हुआ नज़र आता है कहीं तो..
ख़याल होता है, गोर्की है!
पजामे उचके ये लड़के जिनके घरों में बिजली नहीं लगी है
जो म्यूनिसपैल्टी के पार्क में बैठ कर पढ़ा करते हैं किताबें
डिकेन्स के और हार्डी के नॉवेल से गिर पड़े हैं...
या प्रेमचन्द की कहानियों का वर्क है कोई, चिपक गया है
समय पलटता नहीं वहां से
कहानी आगे बढ़ती नहीं है... और कहानी रुकी हुई है।

ये गर्मियाँ कितनी फीकी होती हैं - बेस्वादी।
हथेली पे लेके दिन की फक्की
मैं फाँक लेता हूं...और निगलता हूं रात के ठन्डे घूंट पीकर
ये सूखा सत्तू हलक से नीचे नहीं उतरता

ये खुश्क़ दिन एक गर्मियों का
जस भरी रात गर्मियों की

17. आम

मोड़ पे देखा है वो बूढ़ा-सा इक आम का पेड़ कभी?
मेरा वाकिफ़ है बहुत सालों से, मैं जानता हूँ

जब मैं छोटा था तो इक आम चुराने के लिए
परली दीवार से कंधों पे चढ़ा था उसके
जाने दुखती हुई किस शाख से मेरा पाँव लगा
धाड़ से फेंक दिया था मुझे नीचे उसने
मैंने खुन्नस में बहुत फेंके थे पत्थर उस पर

मेरी शादी पे मुझे याद है शाखें देकर
मेरी वेदी का हवन गरम किया था उसने
और जब हामला थी बीबा, तो दोपहर में हर दिन
मेरी बीवी की तरफ़ कैरियाँ फेंकी थी उसी ने

वक़्त के साथ सभी फूल, सभी पत्ते गए

तब भी लजाता था जब मुन्ने से कहती बीबा
'हाँ उसी पेड़ से आया है तू, पेड़ का फल है।'

अब भी लजाता हूँ, जब मोड़ से गुज़रता हूँ
खाँस कर कहता है,"क्यूँ, सर के सभी बाल गए?"

सुबह से काट रहे हैं वो कमेटी वाले
मोड़ तक जाने की हिम्मत नहीं होती मुझको!

18. खुमानी, अखरोट!

ख़ुमानी, अख़रोट बहुत दिन पास रहे थे
दोनों के जब अक़्स पड़ा करते थे बहते दरिया में,
पेड़ों की पोशाकें छोड़के,
नंग-धड़ंग दोनों दिन भर पानी में तैरा करते थे
कभी-कभी तो पार का छोर भी छू आते थे

ख़ुमानी मोटी थी और अख़रोट का क़द कुछ ऊँचा था
भँवर कोई पीछे पड़ जाए, तो पत्थर की आड़ से होकर,
अख़रोट का हाथ पकड़ के वापस भाग आती थी।

अख़रोट बहुत समझाता था,
"देख ख़ुमानी, भँवर के चक्कर में मत पड़ना,
पाँव तले की मिट्टी खेंच लिया करता है।"

इक शाम बहुत पानी आया तुग़यानी का,
और एक भँवर...
ख़ुमानी को पाँव से उठाकर, तुग़यानी में कूद गया।

अख़रोट अब भी उस जानिब देखा करता है,
जिस जानिब दरिया बहता है।
अख़रोट का क़द कुछ सहम गया है
उसका अक़्स नहीं पड़ता अब पानी में!

19. एक में दो

एक शरीर में कितने दो हैं,
गिन कर देखो जितने दो हैं।

देखने वाली आँखें दो हैं,
उनके ऊपर भवें भी दो हैं,
सूँघते हैं ख़ुश्बू को जिससे
नाक एक है, नथुने दो हैं।

भाषाएँ हैं सैकड़ों लेकिन,
बोलने वाले होंठ तो दो हैं,
लाखों आवाज़ें सुनते हैं,
सुनने वाले कान तो दो हैं।

कान भी दो, होंठ भी दो हैं,
दाएँ, बाएँ, कन्धे दो हैं,
दो बाहें, दो कोहनियाँ उनकी,
हाथ भी दो, अँगूठे दो हैं।

20. कुछ खो दिया है पाइके

कुछ
खो दिया है
पाइके

कुछ
पा लिया
गवाइके।

कहाँ
ले चला है
मनवा

मोहे
बाँवरी
बनाइके।

21. वक़्त को आते न जाते न गुज़रते देखा

वक़्त को आते न जाते न गुजरते देखा
न उतरते हुए देखा कभी इलहाम की सूरत
जमा होते हुए एक जगह मगर देखा है

शायद आया था वो ख़्वाब से दबे पांव ही
और जब आया ख़्यालों को एहसास न था
आँख का रंग तुलु होते हुए देखा जिस दिन
मैंने चूमा था मगर वक़्त को पहचाना न था

चंद तुतलाते हुए बोलों में आहट सुनी
दूध का दांत गिरा था तो भी वहां देखा
बोस्की बेटी मेरी ,चिकनी-सी रेशम की डली
लिपटी लिपटाई हुई रेशम के तागों में पड़ी थी
मुझे एहसास ही नहीं था कि वहां वक़्त पड़ा है
पालना खोल के जब मैंने उतारा था उसे बिस्तर पर
लोरी के बोलों से एक बार छुआ था उसको
बढ़ते नाखूनों में हर बार तराशा भी था

चूड़ियाँ चढ़ती-उतरती थीं कलाई पे मुसलसल
और हाथों से उतरती कभी चढ़ती थी किताबें
मुझको मालूम नहीं था कि वहां वक़्त लिखा है

वक़्त को आते न जाते न गुज़रते देखा
जमा होते हुए देखा मगर उसको मैंने
इस बरस बोस्की अठारह बरस की होगी

22. बर्फ़ पिघलेगी जब पहाड़ों से

बर्फ़ पिघलेगी जब पहाड़ों से
और वादी से कोहरा सिमटेगा
बीज अंगड़ाई लेके जागेंगे
अपनी अलसाई आँखें खोलेंगे
सब्ज़ा बह निकलेगा ढलानों पर

गौर से देखना बहारों में
पिछले मौसम के भी निशाँ होंगे
कोंपलों की उदास आँखों में
आँसुओं की नमी बची होगी।

23. किस क़दर सीधा सहल साफ़ है

किस क़दर सीधा सहल साफ़ है यह रस्ता देखो
न किसी शाख़ का साया है, न दीवार की टेक
न किसी आँख की आहट, न किसी चेहरे का शोर
न कोई दाग़ जहाँ बैठ के सुस्ताए कोई
दूर तक कोई नहीं, कोई नहीं, कोई नहीं

चन्द क़दमों के निशाँ, हाँ, कभी मिलते हैं कहीं
साथ चलते हैं जो कुछ दूर फ़क़त चन्द क़दम
और फिर टूट के गिरते हैं यह कहते हुए
अपनी तनहाई लिये आप चलो, तन्हा, अकेले
साथ आए जो यहाँ, कोई नहीं, कोई नहीं
किस क़दर सीधा, सहल साफ़ है यह रस्ता

24. ज़ुबान पर ज़ायका आता था

ज़ुबान पर ज़ाएका आता था जो सफ़हे पलटने का
अब उँगली ‘क्लिक’ करने से बस इक
झपकी गुज़रती है
बहुत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है परदे पर
किताबों से जो जाती राब्ता था, कट गया है
कभी सीने पे रख के लेट जाते थे

25. हमें पेड़ों की पोशाकों से

हमें पेड़ों की पोशाकों से इतनी सी ख़बर तो मिल ही जाती है
बदलने वाला है मौसम...
नये आवेज़े कानों में लटकते देख कर कोयल ख़बर देती है
बारी आम की आई...!
कि बस अब मौसम-ऐ-गर्मा शुरू होगा
सभी पत्ते गिरा के गुल मोहर जब नंगा हो जाता है गर्मी में
तो ज़र्द-ओ-सुर्ख़, सब्ज़े पर छपी, पोशाक की तैयारी करता है
पता चलता है कि बादल की आमद है!
पहाड़ों से पिघलती बर्फ़ बहती है धुलाने पैर 'पाइन' के
हवाएँ झाड़ के पत्ते उन्हें चमकाने लगती हैं
मगर जब रेंगने लगती है इन्सानों की बस्ती
हरी पगडन्डियों के पाँव जब बाहर निकलते हैं
समझ जाते हैं सारे पेड़, अब कटने की बारी आ रही है
यही बस आख़िरी मौसम है जीने का, इसे जी लो!

26. दरख़्त रोज़ शाम का बुरादा भर के शाखों में

दरख़्त रोज़ शाम का बुरादा भर के शाखों में
पहाड़ी जंगलों के बाहर फेंक आते हैं!
मगर वो शाम...
फिर से लौट आती है, रात के अन्धेरे में
वो दिन उठा के पीठ पर
जिसे मैं जंगलों में आरियों से
शाख काट के गिरा के आया था!!

27. एक नदी की बात सुनी…

एक नदी की बात सुनी...
इक शायर से पूछ रही थी
रोज़ किनारे दोनों हाथ पकड़ कर मेरे
सीधी राह चलाते हैं
रोज़ ही तो मैं
नाव भर कर, पीठ पे लेकर
कितने लोग हैं पार उतार कर आती हूँ ।

रोज़ मेरे सीने पे लहरें
नाबालिग़ बच्चों के जैसे
कुछ-कुछ लिखी रहती हैं।

क्या ऐसा हो सकता है जब
कुछ भी न हो
कुछ भी नहीं...
और मैं अपनी तह से पीठ लगा के इक शब रुकी रहूँ
बस ठहरी रहूँ
और कुछ भी न हो!
जैसे कविता कह लेने के बाद पड़ी रह जाती है,
मैं पड़ी रहूँ...!

28. बारिश आने से पहले

बारिश आने से पहले
बारिश से बचने की तैयारी जारी है
सारी दरारें बन्द कर ली हैं
और लीप के छत, अब छतरी भी मढ़वा ली है
खिड़की जो खुलती है बाहर
उसके ऊपर भी एक छज्जा खींच दिया है
मेन सड़क से गली में होकर, दरवाज़े तक आता रास्ता
बजरी-मिट्टी डाल के उसको कूट रहे हैं!
यहीं कहीं कुछ गड़हों में
बारिश आती है तो पानी भर जाता है
जूते पाँव, पाँएचे सब सन जाते हैं

गले न पड़ जाए सतरंगी
भीग न जाएँ बादल से
सावन से बच कर जीते हैं
बारिश आने से पहले
बारिश से बचने की तैयारी जारी है!!

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Ranjan Gupta

मैं इस वेबसाइट का ऑनर हूं। कविताएं मेरे शौक का एक हिस्सा है जिसे मैनें 2019 में शुरुआत की थी। अब यह उससे काफी बढ़कर है। आपका सहयोग हमें हमेशा मजबूती देता आया है। गुजारिश है कि इसे बनाए रखे।

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