निधि नरवाल की कविताओं का संग्रह आधुनिक दौर की भावनाओं का एक बेहद खूबसूरत और संवेदनशील आईना है। उनकी रचनाएँ जैसे ‘भीतर एक समंदर है’ (पुस्तक) और उनके लोकप्रिय स्पोकन-वर्ड पीस (जैसे ‘एक लड़का है’, ‘मोहब्बत वो नहीं होती’ और ‘अच्छी लगने लगी हूँ’) सीधे दिल को छूती हैं। निधि अपनी कविताओं (Nidhi Narwal poems) में प्यार, अकेलापन, आत्म-खोज, मानसिक स्वास्थ्य और बदलते रिश्तों की बारीकियों को बेहद सहज लेकिन गहरे शब्दों में पिरोती हैं। उनकी भाषा आम बोलचाल की हिंदी-उर्दू (हिंदुस्तानी) है, जो आज की युवा पीढ़ी को अपनी खुद की कहानी जैसी महसूस होती है और सुनने या पढ़ने वाले को एक गहरे सुकून का अहसास कराती है। आइए पढ़ते हैं Nidhi Narwal best hindi poetry
Table of Contents
पतंग (Patang by Nidhi Narwal)
हवा के झोंके जब जुल्फों को उड़ाकर जाते हैं
पलकों को सहला कर जाते हैं
तब लगता है कि अब जाकर
इस खुली हवा में सांस ली है खुल कर
इसी हवा के संग साथ बहती सी लगती है
जिंदगी हंसकर मुझसे कुछ कहती सी लगती है
चलो चलें कहकर हाथ बढ़ाती है हाथ थमाने को
पास आने को पुकारती है मुझे साथ जाने को
और मैं आँखों में ख्वाबों के बने पंख लिए
जिन्दगी का हाथ कस के पकड़ती हूं आगे बढ़ती हूं
इतने में ही पीछे से एक अदृश्य डोर जो मुझसे बंधी हुई है जिससे मैं बंधी हुई हूं
वो मुझे झटके से अपनी तरफ खींच लेती है बार बार
ऐसा लगता है कि मैं कोई रंग बिरंगे पतंग हूं
जो मस्त मल्लिका के भाती अदा से उड़ रही हैं, नाजनीन हवा से लड़ रही है
मगर मेरी एक बेरंग डोर है जो किसी के हाथ में है
या यूं कहूं कि ऐसा लगता है कि मेरी परवाज एक रील में लपेट रखी है और कोई लगातार
मुझे ढील दे रहा है बेबाक होकर जिन्दगी से मिलाने को
और दूसरे ही पल झटके से डोर को वापस खींच लेता है मुझे मेरी हदें याद दिलाने को
और जितनी बार भी ये डोर तंग होती है
मुझे ये महसूस होता है कि मैं उड़ नहीं रही
बल्कि मुझे कोई अपने मुताबिक उड़ा रहा है
और ये हवाएं उसका बखूबी साथ निभा रही हैं
जो उसके हक में चलती जा रही हैं वो भी मेरी नाक के बिल्कुल नीचे से
ऐसा लगता है कि मुझे उड़ने के लिए बनाया गया
बेशक मुझे उड़ने के लिए बनाया गया बढ़िया से तैयार किया सजाया गया
मगर मेरे पंख किसी और के हाथ में थमा दिए और बनाने वाले ने महज तंज करने को मेरी तकदीर में उड़ान लिख दिए
हर शख्स को अपने हाथ में केवल मेरी डोर चाहिए
पर कितने लोगों तो शायद बेसब्री से इस रंग बिरंगी पतंग के कट जाने की राह तकते होंगे ताकि एक कटी हुई पतंग को किसी गली मोहल्ले में वो गिरा हुआ पा सके और फिर उसे हासिल करके अपने ढंग से उड़ा सके
और मैं पागल हूं एक पागल पतंग,
जो आसमान की ऊंचाइयों को छू कर बार बार,
ये अनदेखा कर देती है कि मेरी एक डोर है
जो वहां किसी के हाथ में है।
कोई तो हो (Koi To Ho Nidhi Narwal Lyrics)
कोई तो हो जो सुने तो सुने बस मेरी निगाह को
क्योंकि जुबान पर अक्सर ताले
और नज़रों में बहुत सारी कहानियाँ रखती हूँ मैं
वो मुझसे बात करने आये और कहें
की मुझसे नज़रें मिलाओ
फिर हो यूँ की वो कहें
कि कुछ कहना चाहती हो?
जो नहीं कहना चाहती हो वो तो मैंने सुन लिया
दिल तो हर जगह से टूटा हुआ है मेरा
दिल के हर कोने, हर दीवार में छेद है
मगर कोई तो हो जो झांक कर अंदर आने में दिलचस्पी रखें
झांक कर भागने में नहीं
दिल तो ढेर हो चुका एक घर है
जो मरम्मत नहीं मांगता, बस सोहबत मांगता है
उस शख्स की जो कि इसकी टूटी हुई दीवारों के अन्दर आ कर
इसे जोर जोर से ये बताए कि इसकी बची कुची दीवारे मैली है
जो रंगी जा सकती है
कुछ तस्वीरें टंगी है अब भी पुरानी
जो फेंकी जा सकती है
हाँ वैसे काफी नुकसान हुआ है दर-ओ-दीवार के टूटने से
मगर इसकी बुनियाद अब भी सलामत है
कोई तो हो कि जो देखें तो देखें बस मुझको
कहें मुझसे कि ये मुस्कराहट ना खूबसूरत तो है
मगर ख़ास नहीं
ख़ास है ये ज़ख्म जो तुमने कमाये है पहने नहीं
कहें मुझसे कि ये ख़ुशी मेरी है मैं नहीं
कहे मुझसे कि जो मैं दिखती हूँ ना वो मैं हूँ नहीं
कहें मुझसे कि मैं अपनी नज़्मों को
अपनी ज़हन के आगे का पर्दा बना कर रखती हूँ
पर्दा जिसके आर पार दिखता है
कहें मुझसे कि मेरी मुस्कुराहटें बस मेरी नाकाम कोशिशें है
अपने जज़्बात पे लगाम लगाने के लिए
कहें मुझसे कि ये नक़ाब उतार कर रख दे तू
और आइना देख महज खुद को देखने के लिए
छुपाने के लिए नहीं
कहें मुझसे कि तू दर्द का चेहरा है
दरारों से भरा हुआ, बिगड़ा हुआ
दर्द जो हसीं है, इश्क़ है
कहें मुझसे की तू दर्द है, हसीं है, इश्क़ है
चोरी हुई किताब (Chori Hui Kitab)
यह स्कूल की बात है उस किताब पर नाम मेरा लिखा था
तो जाहीर है कि मेरी थी फिर भी कोई दूजा उसे चुरा ले गया
अब चोर काबिल था या ना समझ पता नहीं
पर एक बात हैं तब भी ख्याल आया था
आज भी आता हैं कि इस चश्म मे तो रहता होगा
वो चोर भी कि पड़ ले समझ ले वो किताब पर
मेरी तरह समझ नहीं पाएगा
क्यू कि वो किताब मेरी थी
यह स्कूल की बात है उस किताब पर नाम मेरा लिखा था
तो जाहीर है कि मेरी थी फिर भी कोई दूजा उसे चुरा ले गया
अब चोर काबिल था या ना समझ पता नहीं
पर एक बात हैं तब भी ख्याल आया था
आज भी आता हैं कि इस चश्म मे तो रहता होगा
वो चोर भी कि पड़ ले समझ ले वो किताब पर
मेरी तरह समझ नहीं पाएगा
क्यू कि वो किताब मेरी थी
उस किताब का 3 4 शेफा मेने हल्का सा फाड़ रखा था
उसने ओर शेफे फाड़ दिये होंगे पर
उस 3 4 शेफे के फटे हुए टुकड़े मेरे पास थे,
शाबित क्या करना था किताब मेरी थी
उस किताब के अंदर रखे हुए कुछ कोरे पन्ने
मे आँगन के फूल की एक पंखुर
ओर एक बोरियत मे बनाये हुआ स्केच उसने फ़ेक दिये होंगे
ताकि यह पता ना लगे किसी को कि वो किताब मेरी थी
एक दिन उस चोर को पकड़ लिया मैंने
मैंने उससे कहा सुनो यह किताब मेरी हैं
उसने किताब पर अपना नाम दिखाया ओर
फटे हुए शेफे दिखाये
ओर बोला नहीं, मैंने कहा सुनो
सुनो धूल जम गई है इस पर
तुम्हारी होती तो यह हसर ना होता इसका
वो चुप हो गया पर माना नहीं की वो किताब मेरी नहीं है
आज के दिन जब मैं तुम्हें किसी ओर की बाहो मे देखती हू
तो तुम्हारी मोहब्बत मुझे उस चोरी हुई किताब सी लगती हैं
एक दिन उस चोर को पकड़ लिया मैंने
मैंने उससे कहा सुनो यह किताब मेरी हैं
उसने किताब पर अपना नाम दिखाया ओर
फटे हुए शेफे दिखाये
ओर बोला नहीं, मैंने कहा सुनो
सुनो धूल जम गई है इस पर
तुम्हारी होती तो यह हसर ना होता इसका
वो चुप हो गया पर माना नहीं की वो किताब मेरी नहीं है
आज के दिन जब मैं तुम्हें किसी ओर की बाहो मे देखती हू
तो तुम्हारी मोहब्बत मुझे उस चोरी हुई किताब सी लगती हैं
करीब तो मेरे भी है तू (Kareeb To Mere Bhi Hai Tu)
KE WO AAKAR NASHEEN HUA,
MERE JISM PAR
ANKHON PAR AJAB SI PYAS THI.
MUJHE KEHNE LAGA TUMHE CHAHTA HU..
MEIN SUN RAHI THI BAATIEN USKI..
MUJHE KEHNE LAGA TUMHARI SHAKAL SURAT MEIN KOI AAB NAHI
TUMHARE MEHBOOB KE ARAYE ISHQ KE KYA KEHNE
SHAYAD MUJHME WO BAAT NAHI..
KAREEB TO TU MERE BHI HAI SACH KEH RAHA HU
BAS TERI ROOH KE MEIN PAAS NAHI
MEIN USSE DUNIYA JANHA SE CHHUPANE LAG JAATI ..
TOH PAGAL SA HOKAR KEHTA KI HAAN,
HAAN AZIZ NAHI HU TUMHARA TO AITRAAZ KARO
OR DOOR RAKHO YE NIGHA TUM..
KUCHH GINTI KE PAL BACHE HEIN MER PASS..
BAS DEKH LENE DO YE CHEHRA MUJHE BEPANHA..
DUM TOD HI JAUNGA..
BHOT JALD MEIN,
KYO WAQT SE PEHLE DETI HO MARNE KI WAJHA TUM..
EK TARFA ASHIQUE THA MERA
THA AFSOS TO USKE SEENE BHI
ISI AFSOS MEIN MACHALTA THA
WO MERE MEHBOOB SE JALTA THA..
kareeb-to-mere-bhi-hai-tu
MAINE BHI NAFRAT TO KHOOB KARI USSE
PAR HASHRA USKA DEKH HAR YE JIGAR ROOTH SA JATA THA..
WO AYA THA KHOONI YAADIEN CHASHMA ANKHON MEIN LIYE
APNI AKHRI SAANSE YAADON M LIYE KU
KUCH WAQT WO ZINDSA RAHA,
MERI MOHABBAT MEIN SHARMINDA RAHA
BEKADRA THA,BEPARWAH THA,,
PAR ZAKHMI THA WO BHI KANHI BEWAJHA TO BEPARWAH KOI HOTA NAHI..
MAINE FIR BHI USKA KHAYAL KARA,,
ROZ USSE SAWAAL KARA
KI AB KAISE ,KI AB KAISE..
WO BADE DIN TOH KHAMOSH RHA..
FIR EK DIN MUJHE MERE MEHBOOB KE YAADON MEIM LIPATTA DEKH..
MUSKURA KAR MUJHSE KEHNE LAGA,
KI TUM OR TUMHARA MEHBOOB..
KAMBKHAT EK JAISE HAI..
TUM BHI TO MERA ITNA KHAYAL MERE WAJOOD KO KHATAM KARNE KE HI LIYE RAKHTI HO..
ZAKHMI HOKAR AYA WO AYA THA WO ZAKHM MERA APNI MAUT KI RANJHIS MEIN..
MERE BADAN PAR DAAG DE GAYA
चक्कर (Chakkar by Nidhi Narwal)
किसी भी रिश्ते मे रूठना मानना चलता है
कभी कभी दूरिया भी आ जाती है
बहुत ज्यादा मगर यार ऐसा है
कि अगर तुम्हारे दिल मे और उस शख्स
के दिल में तुम्हारे लिए और तुम्हारे दिल
मे उस शख्स के लिए जो फिक्र हैं
ना वो सच्ची है तो तुम्हें ये बात हमेशा
याद रखनी चाहिए कि जो दूरिया है
ये बस कुछ पल की है और अक्सर बातें
याद रखने के लिए हम क्या करते हैं
तो यही बात खुद को याद दिलाने के
लिए लिखा हैं मेने एक ख्याल चक्कर
एक बहुत बाड़ा गोल सा चक्कर है
किसी मैराथन ट्रैक के जैसा
इस चक्कर का अखिर चक्कर क्या है
देखो इस चक्कर पर न तुम और मैं
खड़े हैं तुम नहीं तुम और मैं मगर एक
दूसरे की तरफ पीठ करके
तुम उस तरफ मुह किए हो और मैं
इस तरफ क्युकी अभी अभी हम दोनों
ने अपनी अपनी अना को अपनी अपनी
मोहब्बत से उपर रखकर ये तय किया है
कि अब से तुम उस तरफ चलोगे और
मैं इस तरफ कुछ फैसले लिए है
कि अब से ये राहें अलग अलग हैं
अब से हाथ पकड़कर क्या हाथ छोडकर
भी साथ नहीं चलना
तुम रोने लगे तुम्हारे पास भागते
हुए नहीं आना हैं और अगर मैं गिरने
लगी तो तुम ये हरगिज़ नहीं दिखाओगे
कि तुम अब भी परवाह करते हो
और पीछे नहीं मुड़ना याद रखना
पीछे नहीं मुङना याद रखना बिल्कुल
ऐसा ही करना हैं अलग अलग चलना है
अकेले चलना हैं चलते जाना है
एक दूसरे से दूर होते जाना हैं और
पीछे मुड़कर नहीं देखना हैं टस से मस
नहीं होना है चाहे कुछ भी हो जाए
1 सेकंड,
तब क्या होगा जब इस बड़े से चक्कर की
ये दो राहे जिन पर हम अलग अलग
चल रहे हैं ये दोनों एक दूसरे की तरफ
आने लगेंगे तुम यहा आने लगोगे मैं वहां
जाने लगूंगा ना तुम वापिस मुड़ पाओगे
ना मैं वापिस मुड़ पाउंगा क्युकी पीछे नहीं
मुड़ ना हैं ये तो हमने तय किया था और
चलो मान ले मुड़ जाते हैं दोनों मे से
अगर कोई भी एक शख्स मुड़ा और वो
दूसरा नहीं मुड़ा तो वो एक दूसरे के पीछे
चलने लग जाएगा और मानो अगर दोनों
के दोनों मुड़ गए तो वो दोनों एक दूसरे
की तरफ चलने लग जाऐंगे ये सिलसिला
चलता रहेगा तुम और मैं चलते रहेंगे
कभी इस तरफ कभी उस तरफ और घूमते
फिरते कभी एक दूसरे की तरफ और
वेसे ना अलग अलग दिशा मे चलने मे भी
मुझे कोई ऐतराज़ नहीं क्युकी देखो दो
लोग है एक यहा खड़ा है एक यहा खड़ा हैं
ईन दो लोगों को अगर एक दूसरे से दूर
जाना हैं तो अलग अलग दिशा मे चलना
पड़ेगा मगर अगर उन लोगों को एक
दूसरे के करीब आना है तो भी अलग
अलग दिशा मे ही चलना पड़ेगा
तुम्हारा और मेरा रिश्ता महज एक चक्कर
के जेसा है तुम यहा जाओ या यहा वहा
जाओ तुम कहीं ना कहीं मुझसे टकरा ही
जाओगे और फिर अलग अलग भी चलोगे
घूम फिर कर मेरे पास ही आओगे अब
ज़माना यू ही थोड़ी ना कहता हैं कि
इसका और इसका चक्कर चल रहा है
मां बता मुझे (Maa Bata Mujhe By Nidhi Narwal)
माँ तू कमजोर तो नहीं है
ये मैं जानती हूँ
पर मुझे बात करनी है
तुझसे और बात दरअसल ये है
कि मैं यह चाहती हूँ
कि आज तू बात करे मुझसे
तो ठीक है ना तूने खाना खाया दवाई ली
घर पर सब कैसे हैं अच्छा शहर का मौसम
तेरी तबीयत सब कैसा है
तू ठीक है ना मेरी याद आती है
मैं घर आऊँ ये सब नहीं जानना मुझे
ईन सब के जबाब तो मुझे
पहले से पता है क्युकी बर्षों से ये सवाल
और इनके जबाब बदले नहीं हैं
मुझे तुझसे वो जानना हैं
जो तेरी आखों के बगल मे पड़े
नील चीख़ चीख कर मुझे बताता हैं
बच्ची नहीं हूँ माँ बड़ी हो गयीं हू
कहानिया सुनकर नींद नहीं आती
बता वो सच्चाई जो तेरे होठों
पर बर्फ के जेसी ज़मी रखी है
बता वो सब मुझे जिसका शोर तेरी
चुपी से साफ़ साफ़ सुनाई देती है
बता वो किस्सा जो तेरी पीठ पर
मुझे हर बार दिखाई देता है
तेरे सुर्ख गालों पर मेहरून
और नीले धब्बे है
जो घूंघट के पीछे तूने सालों तक रखे है
मगर मुझे नजर आते हैं
माँ तू कितनी भोली हैं
तेरी चूडिय़ां तेरी कलाई की चोट
को छुपा नहीं पाती तेरी हालत
सब बताती है
तू खुद बता क्यू नहीं पाती के
तेरे फर्ज के बदले कौन से किस
किस्म के तोहफे है ये तेरी जीस्त की
आखिर कौन सी किताब के सफे हैं
ये मुझे बता मैं वो किताब फाड़कर
कहीं फेंक दूंगी ये तोहफे देने वाले को
मेरा वादा है तुझसे तोहफे देने वाले
को सूत समित वापिस दूंगी
माँ मैं तेरी बेटी हूं इतना तो
काबिल तूने बनाया है मुझे
कि पैर मे चुभा काटा खुद निकाल
फेंक सुकू गुनाहगारों और गुनाह के मुह
पर एक तमाचा टेक सकू
माँ बता मुझे माथे पर सिंदूर की
जगह ये खून क्यू रखा है तेरा
इसे रखने वाला सच सच बता पिता है
मेरा मुझे शर्म नहीं आएगी अरे
कोई मोहब्बत का इज़हार है
क्या तू बोल तो सही तू बोलती
क्यू नहीं माँ तेरे हकों का इतबार है
क्या मैं कमजोर नहीं हू मैं कमजोर
बिल्कुल नहीं हू माँ मगर मुझसे
बात कर वरना शायद
कमजोर पड़ जाऊँ
टूटा दिल निधि नरवाल (Toota Dil by Nidhi Narwal)
एक टूटे हुए इंसान के पास वो बेहद मिलता है,
जिसके लिए अक्सर लोग तरस जाते हैं उम्मीद।
उम्मीद मिलना बहुत आसान हैं,
मगर उम्मीद रखना शायद सबसे मुश्किल।
मेरा दिल जब पहली दफा टूटा था,
मुझे आज भी याद है मुझे ऐसा लगा था मानो मैंने अपना सब कुछ खो दिया हो। की मनो वो एक इंसान वोह खवाब या वो वक़्त वो एक लम्हा जो बेहद खूबसूरत था बेहद प्यारा था,
जो मुझे कभी ना वापस आने के लिए छोड्र गया, वही मेरा आखिरी था।
और मैं उस वक़्त यही सोच कर बिखरी के वही मेरा आखिरी था,
थोड्रा वक़्त जरूर लगा मगर उम्मीद मिली मुझे,
सारी रात एक खिड्रकि के पास बैठकर अक्शो मै लिपटी
और शिकायतों का ढेर लगा दीया और सुबह होने पर आफताब की
पहली झलक पर बस एक ख्याल आया की अगर यह कम्बख्त हर शाम ढलने के बावजूद भी उतने ही उजाले उतने ही जनून के साथ वापस लोट कर आ सकता है तो मैं क्यों नही। तो मैं क्यों नही।
जब तक मैं चाहती हूँ की मैं ज़िन्दगी तक रहूंगी मैं रहूंगी क्योकि एक बात तो तय है के मोत किसी की नहीं आती मोत को हम बुलाते है। जिसे जाना था वोह तो जा चूका, हां माना के उसके और मेरे दर्मिया कुछ फासले तय हो गए
मगर ज़िंदगी से तो अब तक उतनी ही नज़दीकिया बरकरार हैं।
थोड्रा वक़्त जरूर लगा ज़रूर लगा मगर समझ मैं आया मुझे की पहले तो बस एक दिल धाडरकता था। मगर अब इसे टूट हुए दिल का एक एक टुकड़रा धड़कता है, तो तुम्हे अगर हो भी तो अफ़सोस ना करना की मैं बेकस रह गयी तुम बोसीदा ही छोड़ गए मुझे क्योकि यकीन मनो यह तुम्हारे दिल तोड़ने का ही नतीजा है, की मेरे टूटे हुए दिल की दरारे उम्मीदो से भरी हैं,
यह दरारे अब ज़र के जैसी चमकती हैं और बेहद खूबसूरत लगता है दिल पहले से ज्यादा कई जयादा तो तुम्हारा दिल से शुक्रिया है के तुम दिल तोड़ गए।
टूटा खिलौना (Toota Khilona by Nidhi Narwal)
मेरी एक तस्वीर है।
मेरी एक तस्वीर है, लगभग 15 साल पुरानी।
मैं छोटी-सी नज़र आती हूँ उसमें,
छोटी 4 साल की बच्ची, जिसके दोनों हाथों में दो गुड़ियाँ है
जिनकी हालत बेहद बदतर, बेहद बदतर।
प्लास्टिक की वो गुड़ियाँ, फटे से लिबास में बिगड़े,
जिसके बाल थे टूटे-फूटे जिनके हाल थे।
उन्हें ट्रोफी की तरह उपर उठाकर,
मैं बिखरे हुए से छोटे बालों में मैं हंस रही रही थी,
जोर-जोर से खिल-खिलाते,
बड़े फक्र के साथ जैसे जीत लिया हो मैंने खोकर कुछ।
दिखा रही थी अपनी मां को अपने टूटे खिलौने,
खिलौने जो मैंने जिद्दी होकर खरीदवाए।
कुछ देर तो खेली उससे, संभाल कर प्यार से आराम से,
फिर तोड़-फोड़ कर टुकड़े उनके मैंने पूरे घर में फैलाये।
पर उन टुकड़ों के बीच मैं पूरी थी खुश थी।
मेरा टूटा हुआ दिल यूँ ट्रोफी की तरह उठा नहीं पाती,
दिखा नहीं पाती, मैं मां को दिखा नहीं पाती क्यूँ?
इस बार तो जबकि मैंने खुद ने इसे तोड़ा भी नहीं,
और बिखरे नहीं इनके टुकड़े इसके सिमटे हुए है,
मेरे सीने में चुभते है हर जगह जहन में,
फटा-फटा सा लिबास दिल का कोई दिलचस्प नहीं इसे सीने में क्यूँ?
और लोग सवाल ही सवाल करते है और सवाल भी बेमिसाल करते है
कहते है दिल टूटा तुम्हारा है भी कभी,
कोई तस्वीर ही नहीं
कोई तस्वीर ही नहीं टूटे दिल के साथ मेरे क्यूँ?
फिर उन्हें क्या जवाब दूँ
देखो दिल तो प्लास्टिक का नहीं है,
दिल प्लास्टिक का नहीं है, दिल बाजार में बिकता नहीं है,
दिल रंगबिरंगा नहीं है, दिल कागज़ की कश्ती या तिरंगा नहीं है,
डिब्बे में पैक होके नहीं आता, दिल चाबी से चलाया नहीं जाता,
जान बसती है दिल में, दिल यूँ ही तो नहीं गुमाया जाता,
तोड़ कर यूँ फर्श पर फैलाया तो नहीं जाता।
और दिल तोड़ने वाले मुस्कुराते है, दिल तोड़कर
दिल तोड़ने वाले मुस्कुराते है, दिल तोड़कर क्यूँ?
ना बाजारो था, ना उनका था तो खोना नहीं था ना,
वो तोड़ गये है कि दिल मेरा, दिल तो खिलौना नहीं था ना
दिल तो खिलौना नहीं था। ranjan-gupta.in
Usse Pasand Hai | Nidhi Narwal
दुपट्टा क्या अटका सांकल में,कमबख्त लगा दर पर तुम खड़े होकविता की पुस्तकें और संग्रह पढ़ना
कुछ जख्म अब पायाब है कुछ है अभी ताजे ही
खिड़कियो से तो अब भी झाँकने आ जाता है वो
बंद दिखते है बस उसके दरवाजे
इश्क से मिलकर देखा था जीना मुहाल कर गया
कुर्बत मे लाश छोड़ कर, कब्र मिट्टी से भर गया
अब उससे बात नही करनी,पर अब बात उसी की करनी है
दिन दे दिया ऐ जिंदगी तुझे अपना मगर रात उसी की करनी है
बक्शे अगर मुफ्त मे,मुझे खुदा से एक हसरत खास उसी की करनी है
मै क्या करू इन दीवानो का,मुझे बदतमीजियाँ बस बरदाशत उसी की करनी है
बाते बेहिसाब बताना कुछ कहते कहते चुप हो जाना
उसे जताना उसे सुनाना वो कहता है उसे पसंद है
ये निगाहे खुला मयखाना है,वो कहता है दरवान बिठा लो
हल्का सा बस हल्का सा वो कहता है तुम काजल लगा लो
वैसे ये मेरा शोक नही पर हाँ उसे पसंद है
दुपट्टा एक तरफ ही डाला है उसने कहा सूट सादा ही पहन लो
बेशक तुम्हारी तो सूरत से उजाला है
तुम्हारे होठो के पास जो तिल काला है बताया उसने उसे पसंद है
वो मिलता है तो हँस देती हुँ,
चलते चलते हाथ थाम कर उससे बेपरवाह सब कहती हुँ
सोहबत मे उसकी जब चलती है हवाये,मै हवाओ सी मध्म बहती हुँ
मन्नत पढकर नदी मे पत्थर फेकना,मेरा जाते जाते युं मुडकर देखना
वो गुजरे जब इन गलियो से मेरा खिड़की से छत चुपकर देखना
हाँ,उसे पसंद है
जुल्फो को खुला ही रख लेती हुँ,उसके कुल्हड़ से चाय चख लेती हुँ
मै मंदिर मे जब सर ढक लेती हुँ,वो कहता है उसे पसंद है
ये झुमका उसकी पसंद का है और ये मुस्कुराहट उसे पसंद है
लोग पूछते है सबब मेरी अदाओ का मै कहती हुँ उसे पसंद है
मैं ऐसी नहीं थी (Main Aisi Nahi Thi Poetry Nidhi Narwal)
जिस रस्ते पे में चल रही थी
मुझे मालूम तक नहीं की जाना कहा है
फिर भी चल रही हु
और जिस रस्ते से होकर मैंने यहाँ
तक का सफर तय किया है
उस रस्ते पर युही यु मेरे कदमो के निशान मुझे दिखाई देते है
मगर फिर भी में मुड़कर उस और
वापस नहीं जा सकती
मन करता है काश कोई एक तो नामुमकिन
ख्वाइश मांगने का हक़ तो दिया होता खुदा ने
तो वापस वह तक जाती जहा से सब शुरू हुआ था
मोहब्बत के लिए नहीं सपनो के लिए नहीं
हसरतो के लिए आगाज़ तक जाती
कुकी मुझे मिलना है खुद से और मिलना है उन लोगो
से जोकि तब मेरे साथ थे
जबकि दिन और हम कुछ और ही थे
आज वो हु और अनजान हु उन लोगो से जो मेरे बगल में,
मेरे सामने फगत बैठे है या खड़े है
है मगर इन चेहरों से तो वाक़िफ़ हु
मेहबूब से बिछड़ जाना बोहोत दर्दनाक होता है
मेहबूब से बिछड़ जाना दिल में खलील कर देता है
पैर यक़ीन मनो खुद से बिछड़ जाना बेहतर है, कियो
तुम फोटो हाथ में लेकर लोग दर लोग
पूछ नहीं सकते की इसे देखा क्या
तुम अखबार में इस्तेहार नहीं छपवा सकते की ये लापता है
तुम छुप छुप कर देख नहीं सकते,
मालूम नहीं करवा सकते
की वो इंसान जो खो गया है वो खैरियत से है भी या नहीं
तुम अपनी हालत का भला ज़िम्मेदार किसको टेहराओगे
की कौन छोड़ गया तुम्हे यहाँ,
कियुकी वो इंसान तो तुम खुद हो
तुम अगर रुककर एक जगह खड़े होकर शांति से
याद करने की भी कोशिस करोगे न,
तुम कैसे हुआ करते थे
तो यकीन मनो यादो की जगह बस हाल ही मिलेंगे
ये जीती जगती मौत के जैसा है,
तुम ज़िंदा हो ….तुम ज़िंदा हो …
मगर तुम्हारा ज़नाज़ा बिना चार कंधो के ही उठ चूका है
ऐसे में तुम बस बैठ कर अफ़सोस कर सकते हो
और वो करके भी तुम्हे बस अफ़सोस ही मिलेगा
मगर मुझे एक बार रूबरू होना है खुद से
मुझे देखना है,
मुझे जानना है की आज दिन में आखिर कितनी बर्बाद हु
या और कितनी और मोहलत बची है मेरे पास,
ज़िन्दगी तक वापस आने की
में ये एक खाल का लिबास जिसमे खवाब, मोहब्बत, दर्द,
जिसमजु कुछ भी नहीं है
में ये नहीं हु,
में मेरी रूह को कही पीछे छोड़ आयी हु
मुझे वापस जाना है
में अनजान बानी बोहोत दूर तक आचुकी हु
मुझे एक बार आगाज़ तक ले चलो,
यकीन मनो
मैं ऐसी नहीं हु…
जाना ज़रूरी है क्या | Nidhi Narwal Poetry
जाना जरूरी है,रुके हो या रोक गये हो
सोये हो या सुलाये गये हो
गिर गये या धक्का लगा है
जले हो या जलाये गये हो
जानना जरूरी है,
बेहके हो या बेहकाया गया है
तुम्हे क्या कुछ समझाया गया है
शामिल है गिनती के लोग यहाँ
तुम खुद आये हो या बुलाया गया है
जानना जरूरी है,
मंजिल भी है मकसद भी है जिंदा भी हो
ये भूल गये या भुलाया गया है
आँखॉ में आँसू है,चेहरे पे गम
फिकी तब्बसुम में लिपटे हो तुम
खुद के ही हाथो से गिर कर हो टूटे
या फिर तुम्हे भी सताया गया है
जानना जरूरी है,
कुर्बान हो रहे हो या चुने गये हो
तुम ऐसे ही थे या बुने गये हो
रो दिये या रुला दिया गया
किसी के तो दिल मे थे तुम भी बसे
वो अदा,वो शक्स ,वो जगह
खुद छोड आये,या भगा दिया गया
जानना जरूरी है,
खत्म हो रहे हो या कोई मिटा रहा है
इस्तीफा दे रहे हो या कोई हटा रहा है
ये झूठ,ये फरेब,ये धोखा,ये छल
खुद सीखे है तुमने या कोई सिखा रहा है
जानना जरूरी है,
सिकस्त चुनी तुमने या हराया है तुमको
बात सुनी तुमने या सुनाया है तुमको
ये कैसे फैसले ले रहे हो
ये खुद की समझ है या घुमाया है तुमको
जानना जरूरी है,
ठहरे ही थे तो चल क्यो नही पा रहे
सोये ही थे तो उठ क्यो नही पा रहे
क्या तुम ही थे वो,क्या तुम ही हो ये
जिंदा ही थे तो मर क्यो नही पा रहे
Koi to jarur hoga
नज़र (Nazar)
नज़र चढ़ती है खूब ,नज़र को शराब लिखना चाहती हुँ
नज़र अच्छी नही है जमाने की,नज़र को खराब लिखना चाहती हुँ
नज़र का इंतजार करती है नज़रे,नज़र को खिताब लिखना चाहती हुँ
नज़र इजहार आयी है बन कर,नज़र को गुलाब लिखना चाहती हुँ
नज़र तेज लहर सी है,नज़र को सैलाब लिखना चाहती हुँ
नज़र पढी जाती भी है ,नज़र को किताब लिखना चाहती हुँ
नज़र कितनो से मिली है उसकी,नज़र का हिसाब लिखना चाहती हुँ
नज़र से मारे गये है आशिक,नज़र को तेज़ाब लिखना चाहती हुँ
नज़रो ने सवाल किये है मुझसे,नज़र का जबाब लिखना चाहती हुँ
नज़र के पीछे रहता है मकसद,नज़र को नकाब लिखना चाहती हुँ
andhera
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